आस्था व विश्वास का केंद्र महाहरधाम,शिवरात्री की चल रही तैयारी 

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मरदह गाजीपुर।कोविड 19 के मद्देनजर प्रदेश सरकार द्वारा कावड़ यात्रा पर रोक लगाएं जाने पर सावन माह का रंग फीका रहा।वहीं दूसरी ओर एक मार्च महाशिवरात्री पर्व को लेकर क्षेत्र के पौराणिक सिद्ध पीठ महाहर धाम शिव मंदिर पर तैयारी जोर शोर से चल रही।मंदिर परिसर में साफ सफाई,रंगाई पोताई, प्रकाश,पेयजल,सुरक्षा को लेकर अनवरत दिन रात कार्य किए जा रहे हैं।महाशिवरात्री के अवसर पर एक तरफ जलाभिषेक के साथ चार दिन चलने वाले मेलों में दर्शनार्थियों सहित ग्रामीण क्षेत्रों के हजारों लोगों द्वारा मेले का लुत्फ भी बढ़चढ़ कर ऊठाया जाता।मालूम हो कि आस्था और विश्वास का केंद्र है महाहर धाम जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर मरदह विकासखंड के सुलेमापुर देवकली ग्राम पंचायत में स्थित सिद्धपीठ शिवस्थली महाहर धाम भक्तों के लिए आस्था एवं विश्वास का एकमात्र केन्द्र है।इसकी एक अलग अपनी पहचान है।शिवस्थली के रूप में इसका नाम प्रमुखता से लिया जाता है।उत्तरी भाग पर स्थित इस धाम पर जहां महाशिवरात्रि पर भक्तों का रेला उमङता है।वही पूरे सावन माह मंदिर परिसर घंटों की आवाज से गुंजायमान रहता है।जहाँ पर एक तरफ पूरे पूर्वांचल के जिले सहित पड़ोसी राज्य के भी श्रध्दालु इस धाम पर पहुंचकर दर्शन पूजन कर बाबा भोलेनाथ से मन चाहा मुराद मांगते है।इस धाम कि ऐसी मान्यता है कि यहां स्थापित शिवलिंग का दर्शन करने से मनुष्य के सारे पाप कट जाते हैं।सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद भोले पूरी करते हैं।कहां जाता है कि इस धाम का निर्माण राजा दशरथ ने कराया था।यह महल दशरथ के गढ़ी के नाम से विख्यात है।वेदों व पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार श्रवण कुमार की यही पर राजा दशरथ के चलाए गए शब्दभेदी वाण से मृत्यु हो गई थी।धाम के दक्षिण तरफ श्रवणडीह नाम का गांव भी विद्यमान है,जहां पहले से बनाया गया श्रवण कुमार का मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुंच चुका है।धाम परिसर में शिव मंदिर के अलावा भगवान हनुमान, भैरव -बाबा,संत रविदास,भगवान ब्रम्हा की चार मुखी प्रतिमा,माँ दुर्गा की प्रतिमा,राधा-कृष्ण,राम-लक्ष्मण – जानकी,की प्रतिमा सहित कई देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित की गई है।तेरह मुखी मुख्य शिवलिंग के साथ ही शिव-पार्वती की युगल मूर्ति भी अद्भुत व पूजनीय है।मंदिर के सामने उत्तर से दक्षिण तरफ दिशा में एक किलोमीटर तक लम्बा सरोवर है,जहां हजारों वर्ष पहले इस स्थान पर माँ गंगा का प्रवाह था,जो अब पूरईन झील के रूप में रह गया है जो 365 बिग्हे क्षेत्रफल में फैला हुआ है।