पौराणिक कथाओं के माध्यम से धार्मिक भावनाओं को विकसित किया जाता

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जखनियां गाजीपुर।वैसे भारत त्योहारों का देश है।त्योहारों के जरिए आपसी अन बन भुलाकर आपसी मेल और सद्भाव के जरिए एकता और अखंडता की नींव को मजबूती दी जाती है। पौराणिक कथाओं के माध्यम से धार्मिक भावनाओं को विकसित किया जाता।यही वजह है की *होली के दिन दिल खिल जाते हैं रंगों में रंग मिल जाते हैं*

और शहर से लेकर गांव तक, कस्बों और बाजारों तक बाल्टी के बाल्टी उड़ेलते रंग उड़ते अबीर गुलाल युवक युवतियों के सूर्ख होते गाल सबके सब विना कहे बता रहे होते थे की *बुरा न मानो होली है।*

आज से लगभग चार दसक पहले जहां आपसी भाईचारा,होली का खुमार सबके सिर चढ़कर रंगोत्सव का अहसास कराता था आज वह वहां से सबकुछ लुप्त हो चला है चालीस साल पहले माघ मास शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि से समस्त गांव के लोगों द्वारा होलिका गाड़ने से लेकर होलिका दहन तक का मध्य भाग अपने आप में काफी खुशनुमा खुशमिजाज हुआ करता था। गांव के बड़े बुजुर्गो संग युवकों की गायन मंडली से गूंजते चौपाल पर चौताल और झूमर संग बेलवईया फाग होलीऔर कबीरा अत्यंत फूहड़पन के बावजूद किसी को नागवार नहीं लगने वाले थे। गांव के चौपाल पर होने वाले चौताल और झूमर क्लिष्ट हिन्दी भाषा साहित्य के नव रस से सराबोर गीतों का शब्द विन्यास और उसके शुद्ध उच्चारण सुयोग्य और शिक्षित होने के पुख्ता सबूत थे। बसंत आगमन पर बागों अमुराईयों में कूंकती कोयल और आम्रमंजरी से मंहकती दशो दिशाएं मंजरियों पर रसास्वादन के लिए गुंजार करते भ्रमरों के दल अपने आप में अद्भुत थे।झूमर गीत का नमूना कुछ इस तरह का था *विरहिन दुख अगमल खाने बसंत निराने,लख्यौ अंब बगराज मधुकर कूंच दिखाने,वृक्ष भयो पतझार टेषु वन माह फुलाने–*

विरह गीतों में बारह मासा चौताल और प्रश्नवाचक पहेली दार बेलवइया की भी काफी धूम हुआ करती थी। चौताल का एक उदाहरण *परदेशवा बलमुआं सिधारे विरह दुःख डारे ,माघ बाघ सम फाड़ खात फागुन फगुआ ललकारे,चैत चमेली चवहुं दिशी फूलल, कोयल नभ कहर गुजारे विरह दुःख डारे–*

इसी तरह बेलवइया भी काफी दिमाग गीत थी जैसे: *है गहरा ऐलान चार प्रश्न पर भाई,दिजै बतलाय चार प्रश्न पर भाई,कौन वृक्ष जहां में जिसकी तीन प्रमुख हैं शाखा,कोटि बहत्तर लटकी डाली बन्धन जकड़ के बांधा आदि–* काम प्रधान गीतों के अलावा भक्ति प्रधान गीतों का भी जलवा रहा था। जैसे *मैं तो सुमिरहुं आदि भवानी रे माया, मातु जगदंबा देवी देखौ मैं तोर शिवा नंगा, होली खेलैलैं पवन कुमार लंका मझार चढ़ी, आदि–*

गांव की अहम विशेषता यह थी कि एक दुसरे के प्रति अगर अनबन भी थी तो बहुत टिकाऊ नहीं हुआ करती थी। सामाजिक समरसता का मोल था।तभी तो होली के हुड़दंग में सबके सब एक सा नजर आते थे। लगभग डेढ़ महीने तक चलने वाले होली रस रंग में नौटंकी मंचन काबिले तारीफ था। गीतों भरा पात्रों का दृढ़ता पूर्वक संवाद मंचन मन को विनोद से भर देता था। गायकी में तन्मयता वाद्ययंत्रों के मेल का कोई जबाव नहीं था। होली के दिन विविध भांति के बने पुआ पकवान उम्दा मिष्ठान गुझिया आदि से द्वार पर आए बंधुबांधवो का सत्कार किसी अतिथि स्वागत से कम नहीं था।छनती भंग गटकते लोग चढ़ती नशा दीवाना बना देती थी।शौक ऐसा कि सुदूर क्षेत्रों से नामचीन पुरूष नर्तक को सामुहिक ख़र्च पर बुलाया जाता था और होली बाद बुढ़वा मंगल के बाद सहर्ष पारितोषिक के अलावा अन्न वस्त्र एवं आर्थिक लाभ संग विदाई दी जाती थी।ना जाने किसकी नज़र लग गई की गांव की एकता अखंडता मर्माहत होने लगी।अब पहले जैसा परिवेश का होना दीवास्वप्न सा हो चला है। बड़े बुजुर्गो के अनुसार गांव में हड़प और पांव पसारने की कूटरचित साजिश ने कटुता का बीज बो दिया जिससे वर्तमान युवा पीढ़ी काटने को मजबूर हैं। कुछ कुंठित मानसिकता के धनी लोगों की कुटिल साजिश के चलते गांव का मधुर संबंध आपसी प्रतिशोध वैचारिक मतभेद में तब्दील हो गए।जो गांव के चतुर्दिक विकास में रोड़ा का काम करने से बाज नहीं आते।